राष्ट्रीय कवि संगम
Jun 3rd, 2007 by admin
कवि का निर्माण विश्व के किसी भी प्रशिक्षण संस्थान में नहीं होता क्योंकि कविता तो प्रकृति का वरदान है और अभ्यास करते करते व्यक्ति कवि बन जाता है।
कवि चन्द्रबरदाई की पंक्तियॉ “चार बांस, चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, तहाँ बैठो सुल्तान है, मत चुको चौहान” या बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा रचित “वन्दे मातरम्” या सुभद्रा कुमारी चौहान की “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी” या राम प्रसाद बिस्मिल की “सरफरोशी की तम्मना अब हमारे दिल में है” या मैथली शरण गुप्त की “हम क्या थे, क्या हो गये, क्या होना है अभी” और भी अनेक उदाहरण राष्ट्र के आजादी आन्दोलन में कवि और कविता के योगदान के दिये जा सकते है।
आज भी राष्ट्र अनेक राष्ट्रीय आपदाओं जैसे – आतंकवाद, अलगाववाद, माओवाद, घुसपैठ, सीमाओं पर बढते कुछ पड़ोसी देशों से खतरे, बढती जनसंख्या, धर्मान्तरण (मतान्तरण), अन्तर्राष्ट्रीय ताकतों के अन्दरूनी षड़यन्त्र, बदलता जनसंख्या का स्वरूप, अल्पसंख्यकवाद, तुष्टीकरण की वोट राजनीति, गऊवध का न रुकना, हिन्दुत्व को संकुचित बताना, प्रगतिशीलता के नाम पर देवी-देवताओं का अपमान, कैलाश मानसरोवर व अन्य भू-भाग चीनी कब्जे में, अफजल को फांसी की बजाय माफी, कंधार प्रकरण में आतंकवादी छोड़ना, वन्दे मातरम् न गाना, रामसेतु तोड़ना, एक राष्ट्र व राष्ट्रीयता का अभाव, समान कानून संहिता के अभाव में बिखरता व भ्रमित समाज, जातिवादी विषमता का दंश, अपराध, भ्रष्टाचार, घोटाले, व्यसन, अशिक्षा, प्रदूषण, सांस्कृतिक जीवन मूल्यों में गिरावट, उपभोक्तावाद आदि-आदि से घिरा अपना राष्ट्र मुक्ति के लिए छटपटा रहा है।
कवि व्यक्तिगत रूप में उपरोक्त समस्याओं पर अपनी कलम चलाता है परन्तु आवश्यकता है सामूहिक रूप से आन्दोलन के रूप में कुछ करने की।
साहित्यकार, लेखक, चिकित्सक, अभियन्ता, उद्योगपति भिन्न-भिन्न वर्गों के लोग आज समूह के रूप में कार्य करते है परन्तु कवि समाज आज तक इस रूप में कार्य करता हुआ दिखाई नहीं पड़ा।
एक कविता कई भाषणों का निचोड़ होती है क्योंकि कविता में रोचकता होती है इसलिये युवा पीढ़ी सहजता से कविता की ओर आकर्षित होती है।
आजादी की महान क्रान्ति के 150 वर्ष एवं स्वतन्त्रा प्राप्ति के 60 वर्ष पूर्ण होने पर 2007 में 22-23 दिसम्बर को दिल्ली में राष्ट्रीय कवि संगम का आयोजन कवि समाज के राष्ट्रीय नव निर्माण में सामूहिक भूमिका निश्चित करने का एक एतिहासिक कार्य होगा।
10 Responses to “राष्ट्रीय कवि संगम”
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hame fir se aazad hindustan chahiye
ambedkar ka likha sawidhan chahiye
bhukhe-nange khuni bhediye nahi
rajniti main hame insaan chahiye,
namshkar rajesh ji
hum kalamkar kalam se likhte
kalam ke shishtachari hain
kalam hamari mout jindgi
kalam ke hum pujari hain,
AMIT SAGAR
CONTECT NO.: 09213589921
You are doing a great job:
Andhron me chamakta jo sitra Dhoond lete hain
Gamon me Bhi vo khushiyon ka sahara dhoond lete hain
ke jinke dil me hai hardam zunoon han jeetane ka bas
vo har toofan me apna kinara dhoond lete hain….
With great pleasure and best wishes:
Arun Mittal Adbhut
namashkar
main amit sagar aapka dost aap sabhi chahne walon ka hardik dhanyawad karta hoon aur asha karta hoon ke aap mera isi tarah hosla afjayi karte rahenge,
kiis phool ka tohfa doon tumhe is patjhar ke mousam main,
kante bhi nahi bache hai aaj mujh bahar ke daman main
unka nasib duniya main jo jhooka nahi karte
manjil unko milti hai rahon par jo rooka nahi karte
yeh raste hai pathrile bahut pair fisal bhi jata hai
kaanto par chalne ki himmat hai unme jo thakaa nahi karte
स्वतंत्रता प्राप्ति जैसी अनमोल मणि
सठिया को इकसठिया बनाने के लिए
किए जा रहे आपके कारनामे
सदा याद किए जाएंगे हम तो
इसे कभी बिसरा नहीं पायेंगे
याद करें या न करें सदैव
याद आयेंगे अविस्मरणीय बन यादों को,
मन को, मानस को महकायेंगे।
अविनाश वाचस्पति
9868166586
Hello ,
My name is rahul yadav and i am a poet in ojj so can i know if I was unable to attand the last chance so can I have a chance more to get my self in kavi sangam ? When will the nest program will be ?Your program was da great.
Thanks
Rahul yadav
aap logoun ko ubharti houi pratibhoun ko protsahit karna chahiye
kyonki aajkal kavisammelanoun mein ho rahi sodevaji se naye kavi nikal nahi pa rahe hein specially chhoti jagehoun se
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ????????
ना मराठी इन की बाप की बपोती है
ना हिन्दी कुछ दोगलो की है रखेल
कोई तों इन दोगलो से कहे
राखी सावंत तुम्हारे ही घर की बेटी थी
क्यों ना सभाल पाए
अब जब की वाला साहेब ठीक से
उठ-बैठ नहीं पते है तों समाना मे
सम्पदयाकी और आर्टिकल कोन लिख रहा होगा,
कोई पूछे तों राज और उद्धव ठकारे से
बेटा- बेटी और वीबी किस भाषा मे पडी लिखी है
कुत्ते की भोक और शेर की दहाड़ मे अंतर होता है
मेरे दोस्त ………………..
जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली हिंदी बिंदी वाणी रहे ,
सुनो हरवोलन की बोली जाने कि के जाये तुम,
जाने किन की बोली सबरी गुईया (भाषा)मिल जुल कहे
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
हरबोला जू कह रहे,हर-हर बम-बम बोली
उद्धव सुनो! कबे फुके ऐसे राज की होरी
जय मराठा, जय मराठी और हिंदी ????????
जय रहे मराठा, अमर रहे मराठी बोली
Kavi Hardayal Kushwaha
सिंधु का श्रजन
…………………..
कभी वास्तविक कथा पर आधारित
कल्पनिक चलचित्र में,
नायक ने सहायक से
पूछा कुछ इस तरह ,
साब! ये कंपनी क्या होती है ?
सहायक अंग्रेज बहादुर ने,
नायक हिंदू सिपाही को
कुछ इस तरह समझाया
————————————
“जैसे तुम्हारी रामायण में एक राक्षस है
दस सिरोवाला रावण !
वैसे ही कंपनी भी दस शीरोधारी रावण हुआ करती है ”
जो हर ओर से निग़लाना जानती है
और स्वयं को श्रेष्ठ मानती
नायक ने कंपनी बहादुर के बहादुर से जो भी सीख पाई हो
फिल्म पर्दे पर जैसे भी दिखाई हो
————————————
आज के विलासी समाज की समझ भले ना आई हो
किंतु मेरी तुच्छ सी मती में इतना समझ आ गया
कंपनी का अंग्रेज बहादुर शब्द थोड़े में
बीज मंत्र कंपनी का हमें दिखा गया
ज़रा सोचो तो सही ?
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दशानन दो हाथो से सीर बीस को कैसे खिलाता होगा
दस दिमागों के निर्णय को निश्चय तक कैसे लाता होगा
द्वंद मचाते हो मस्तिष्क दसो दिशाओं से
द्रविण अधीराज रावण ,
लंका से कैलास तक नित्य कैसे जाता होगा
दृगबीस से दैत्रोराज लंकेश, कैसा द्रष्टीकोण
कहना सरल है
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दो द्रगो को नियंत्रित,
दो वक्त को कर लीजिये |
दो पैरो पर दस सीरो,
सह भुजा बीस धर लीजिये |
एक प्रयाश है मेरे मित्रो,
धारा से उठने का सहस कीजिए |
अब चल के दिखाओ,
गर हिम्मत है तो युद्ध कीजिए|
बात तो तब है
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सोने की छोड़ गारे की लंका बाना दीजिए
हमने सोडीत से सीचा,
तुम पसीना बाहा दीजिये
पत्नी को परिवार कहते हो,
बंधुओ बड़े शान से
लाख सबा लाख के कुटुम्बियों के संग दो दिन रह लीजिए
My Book : Sindu Kaa Desh
Kavi Hardayal Kushwaha
09911197344